Posts

मर्ज़ी तुम्हारी

तेरे कहने से जब मैं संवर भी गया तेरे कहने से मैं बिगड़ जाऊंगा जैसे चाहे मुझे , वैसे करना फ़ना बोल दे फिर कभी न नज़र आऊंगा  

सफर का अंत

 सफर में था मैं जब पाया तुम्हें पकड़ हाथ संग में ले आया तुम्हें थी मंज़िल भी एक जहाँ जाना था तुम नज़रें झुका कर कहीं चल दिए

वक़्त गुज़र रहा है...

वक़्त गुज़र रहा है ...  हर वक़्त, वक़्त के साथ बस गुज़र रहा है बनता हो गर कोई खुदा कोई खुद में तो रोक के दिखाए दरअसल मेरा कुछ काम बाकी है किसी को चुकानी हैं मेरी शाम , बाकी है गर ताकत हो किसी में ज्यादा वक़्त से दो हाथ करके दिखाए पहले तो कभी नहीं हुआ ये काश कोई अब करके दिखाए कोई बात नहीं जाने दो , छोडो मुझपर मेरा ही तो काम बाकी है वक़्त भी तो वक़्त का इंतज़ार कर रहा है वक़्त गुज़र रहा है...